नीचे बंद कमरों में घुटन तो होती है
छत पे आता हूँ तो आसमाँ हो जाता हूँ मैं
कौन किसको बताता है
यहाँ आसमाँ होने की बात?
ख़ुद ही को तो छूना है
और ख़ुद ही के साथों-साथ
कौन किसको बताता है?
शहर की चमक से धोखा तो होता है
ज़मीर पे आता हूँ तो मैं ज़मीं हो जाता हूँ मैं
कौन किसको बताता है
यहाँ ज़मीं होने की बात?
ख़ुद ही को तो चलना है
और ख़ुद ही के साथों-साथ
कौन किसको बताता है?
दिमाग़ से जीने में उलझन तो होती है
दिल पे आता हूँ तो मैं दरिया हो जाता हूँ मैं
कौन किसको बताता है
यहाँ दरिया होने की बात?
ख़ुद ही को तो डुबोना है
और ख़ुद ही के साथों-साथ
कौन किसको बताता है?