तेरे सिरहाने में रखी
मेरे दिल की एक टीस है
ख़ामख़ाँ सताती वो
बे-वक़्त चली आती है
क्या है ये माजरा?
अब तू ही बता दे, क्या ख़ला है?
इस मर्ज़ की क्या दवा है?
तू बता दे, क्या ख़ला है?
इस मर्ज़ की क्या दवा है?
बेवकूफ़ सा लगे दिल मेरा कभी-कभी
बेवकूफ़ी तो हमने की सारी बातों को समझने की
दिल की दुनिया में दो-दो; पाँच, कभी हैं ख़ाली
नासमझ सा देखे, इसकी हर बाज़ी मैं हारी
क्या है ये माजरा?
अब क्या ही बताऊँ, क्या ख़ला है
इस मर्ज़ की ना दवा है
क्या बताऊँ, क्या ख़ला है
इस मर्ज़ की ना दवा है